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लम्स-ए-यक़ीन अपना कहाँ पेश-ओ-पस में था | शाही शायरी
lams-o-yaqin apna kahan pesh-o-pas mein tha

ग़ज़ल

लम्स-ए-यक़ीन अपना कहाँ पेश-ओ-पस में था

आमिर नज़र

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लम्स-ए-यक़ीन अपना कहाँ पेश-ओ-पस में था
तो फिर ये कैसा जोश सदा-ए-जरस में था

ज़र्रों के इंतिशार ने मश्कूक कर दिया
यूँ उक़्दा-ए-वजूद भी मीज़ान-ए-ख़स में था

था जिस्म इब्तिदा से अज़िय्यत की क़ैद में
क्यूँ ग़ाज़ा-ए-ख़्याल मुनव्वर क़फ़स में था

साकित ज़मीं के जिस्म पे हंगामा-ए-सदा
यूँ लश्कर-ए-हयात रवाँ बे-नफ़स में था

क़िर्तास-ए-ज़ात पर तिरे 'आमिर' जो खिल उठा
वो नुक़्ता-ए-उरूज कहाँ तेरे बस में था