कुछ भी कर गुज़रने में देर कितनी लगती है
बर्फ़ के पिघलने में देर कितनी लगती है
उस ने हँस के देखा तो मुस्कुरा दिए हम भी
ज़ात से निकलने में देर कितनी लगती है
हिज्र की तमाज़त से वस्ल के अलाव तक
लड़कियों के जलने में देर कितनी लगती है
बात जैसी बे-मा'नी बात और क्या होगी
बात के मुकरने में देर कितनी लगती है
ज़ो'म कितना करते हो इक चराग़ पर अपने
और हवा के चलने में देर कितनी लगती है
जब यक़ीं की बाँहों पर शक के पाँव पड़ जाएँ
चूड़ियाँ बिखरने में देर कितनी लगनी है
ग़ज़ल
कुछ भी कर गुज़रने में देर कितनी लगती है
नोशी गिलानी

