कोई शय डूबे तो दरिया में लहर जागे है
कब अज़ाँ मुर्ग़ के देने से सहर जागे है
कंकरी मारे से पानी में असर जागे है
इक ज़रा ख़्वाहिश-ए-पर्वाज़ से पर जागे है
उन को मिम्बर की बुलंदी से तशफ़्फ़ी न हुई
जिन की आवाज़ पे तहरीक का सर जागे है
नींद की काई से बोझल है हर इक आँख मगर
संग के ख़ौफ़ से शीशे का नगर जागे है
लज़्ज़त-ए-दर्द समुंदर से नहीं सीप से पूछ
जिस की आग़ोश में क़तरे से गुहर जागे है
रंग-ओ-रोग़न के बदलने से भला क्या हासिल
नन्ही किलकारियां जागे है तो घर जागे है
फिर ख़ँघलने को है क्या ख़ित्ता-ए-ना-दीदा कोई
फिर कफ़-ए-पा में सर-ए-शौक़-ए-सफ़र जागे है
घर के पिछवाड़े महकती हुई सरगोशी से
कितने बीते हुए लम्हों का खंडर जागे है

ग़ज़ल
कोई शय डूबे तो दरिया में लहर जागे है
शमीम अनवर