किसी नग़्मे में है वो और न किसी साज़ में है
रस-भरी नर्म सी लय जो तिरी आवाज़ में है
गोश मुश्ताक़ की ख़ुद-साख़्ता तफ़रीक़ है ये
वर्ना जो साज़ है बाहर है वही साज़ में है
ले न डूबे कहीं ख़ुशफ़हमी-ए-इदराक तुझे
ना-ख़ुदाई तिरी पोशीदा इसी राज़ में है
आप ही ज़िंदा करें मुर्दा तमन्नाओं को
क़ुम-बे-इज़्नी का असर आप की आवाज़ में है
हम-सफ़ीरों की सदाओं का असर है शायद
हर गिरफ़्तार-ए-क़फ़स कोशिश-ए-परवाज़ में है
क्यूँ करें ग़ैर से हम अर्ज़ नियाज़-ए-उल्फ़त
जिस के तालिब हैं अभी जल्वा-गाह-ए-नाज़ में है
'अर्श' तक देखिए पहुँचे कि न पहुँचे कोई
आह के साथ दुआ भी मिरी पर्वाज़ में है
ग़ज़ल
किसी नग़्मे में है वो और न किसी साज़ में है
अर्श मलसियानी

