ख़ुश्बू संदल और न गहना दुख देगा
इक जैसा दुख सहते रहना दुख देगा
डरती क्यूँ है आँखें तेरी अच्छी हैं
लेकिन इन का चुप चुप बहना दुख देगा
जो हम दोनों ने मिल-जुल कर झेले थे
वो दुख तेरा तन्हा सहना दुख देगा
जिस ने हम को आँगन आँगन बाँट दिया
अब तो उस दीवार का ढहना दुख देगा
ग़ज़ल
ख़ुश्बू संदल और न गहना दुख देगा
इशरत आफ़रीं

