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कहूँ क्या फ़साना-ए-ग़म उसे कौन मानता है | शाही शायरी
kahun kya fasana-e-gham use kaun manta hai

ग़ज़ल

कहूँ क्या फ़साना-ए-ग़म उसे कौन मानता है

क़तील शिफ़ाई

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कहूँ क्या फ़साना-ए-ग़म उसे कौन मानता है
जो गुज़र रही है मुझ पर मिरा दिल ही जानता है

तू सबा का है वो झोंका जो गुज़र गया चमन से
न वो रौनक़ें हैं बाक़ी न कहीं सुहानता है

उसे मैं नसीब जानूँ की बशर की ख़ुद-फ़रेबी
कोई भर रहा है दामन कोई ख़ाक छानता है

तिरा यूँ ख़याल आया मुझे ग़म की दोपहर में
कोई जैसे अपना आँचल मिरे सर पे तानता है

मैं निज़ाम-ए-ज़र की देवी से 'क़तील' आश्ना हूँ
कहीं नाम उस का सलमा कहीं चन्द्रकान्ता है