कहीं ज़ाहिर ये तेरी चाह न की
मरते मरते भी हम ने आह न की
तू निगह की न की ख़ुदा जाने
हम तो डर से कभू निगाह न की
सब के जी में ये नाला हो गुज़रा
एक तेरे ही दिल में राह न की
आह मर गए प ना-तवानी
एक भी आह सरबराह न की
वो किसू और से करेगा क्या
जिन ने तुझ से 'असर' निबाह न की
ग़ज़ल
कहीं ज़ाहिर ये तेरी चाह न की
मीर असर

