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कहीं ज़ाहिर ये तेरी चाह न की | शाही शायरी
kahin zahir ye teri chah na ki

ग़ज़ल

कहीं ज़ाहिर ये तेरी चाह न की

मीर असर

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कहीं ज़ाहिर ये तेरी चाह न की
मरते मरते भी हम ने आह न की

तू निगह की न की ख़ुदा जाने
हम तो डर से कभू निगाह न की

सब के जी में ये नाला हो गुज़रा
एक तेरे ही दिल में राह न की

आह मर गए प ना-तवानी
एक भी आह सरबराह न की

वो किसू और से करेगा क्या
जिन ने तुझ से 'असर' निबाह न की