कभू हम से भी वफ़ा कीजिएगा
या यही जौर-ओ-जफ़ा कीजिएगा
देखें दुश्नाम कहाँ तक दोगे
दम में सौ बार दुआ कीजिएगा
नज़र आता है गिरह ज़ुल्फ़ से खोल
हर तरफ़ फ़ित्ना बपा कीजिएगा
जान-ओ-दिल से भी गुज़र जाएँगे
अगर ऐसा ही ख़फ़ा कीजिएगा
की है बंदे के लिए ये बे-दाद
रहम टुक बहर-ए-ख़ुदा कीजिएगा
इश्क़ के सदक़े उठाता था दिल
अब तो वो भी नहीं क्या कीजिएगा
अब तो टुक मेरा कहा कीजिए फिर
चाहिएगा सो कहा कीजिएगा
गो उसे अहल-ए-वफ़ा से है ख़िलाफ़
अब 'असर' तू भी वफ़ा कीजिएगा
ग़ज़ल
कभू हम से भी वफ़ा कीजिएगा
मीर असर

