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जो हो वरा-ए-ज़ात वो जीना ही और है | शाही शायरी
jo ho wara-e-zat wo jina hi aur hai

ग़ज़ल

जो हो वरा-ए-ज़ात वो जीना ही और है

शानुल हक़ हक़्क़ी

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जो हो वरा-ए-ज़ात वो जीना ही और है
जीने का अहल-ए-दिल के क़रीना ही और है

तुम सिक्का-ए-रवाँ की हवस में हो तुम को क्या
जूया हैं जिन के हम वो ख़ज़ीना ही और है

हम साहिल-ए-नजात पे कश्ती जला चुके
अब रहनुमा कोई न सफ़ीना ही और है

लिख कर दिया था उस ने जो वादा विसाल का
उस में कोई नया सा महीना ही और है

फेंकी न जाने उस ने मिरी क़ाश-ए-दिल कहाँ
अंगुश्तरी में अब तो नगीना ही और है

पहुँचा सँभल सँभल के सर-ए-बाम तब खुला
मंज़िल नहीं ये उस की ये ज़ीना ही और है

वो दिन गए कि सोते थे हम भी पसारे पाँव
मुद्दत से अब तो शग़्ल-ए-शबीना ही और है

'हक़्क़ी' ये अपना चश्मा-ए-रंगीं उतारिए
देखेंगे फिर कि दीदा-ए-बीना ही और है