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जान जाता है अब तो आ जानी | शाही शायरी
jaan jata hai ab to aa jaani

ग़ज़ल

जान जाता है अब तो आ जानी

सिराज औरंगाबादी

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जान जाता है अब तो आ जानी
हिज्र की आग पर छिड़क पानी

दामन ओ आस्तीं कूँ रो रो कर
ख़ून-ए-दिल सीं किया हूँ अफ़्शानी

ज़ुल्फ़ तेरी सीं दाद पाऊँगा
हात आई है अब परेशानी

लाला-रू फिर बहार आई है
क्यूँ न हुए फूल की फ़रावानी

गंज-ए-मख़्फ़ी सीं आश्ना है 'सिराज'
जब सीं हुई है निगाह रहमानी