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इश्क़ में आ कि अक़्ल कूँ खोनाँ | शाही शायरी
ishq mein aa ki aql kun khonan

ग़ज़ल

इश्क़ में आ कि अक़्ल कूँ खोनाँ

सिराज औरंगाबादी

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इश्क़ में आ कि अक़्ल कूँ खोनाँ
बा-ख़िरद हो के बे-ख़िरद होनाँ

फ़र्श-ए-मख़मल सीं मुझ कूँ बेहतर है
ग़म के काँटों की सेज पर सोनाँ

अब्र-ए-रहमत है बीज वहदत का
कुंज-ए-मख़्फ़ी के खेत में बोनाँ

ख़ंदा-ए-गुल है गिर्या-ए-शबनम
है हँसी यार की मिरा रोनाँ

रूप दरसन दिखा ऐ सीमीं-तन
नहीं तो जाता है हात सें सोनाँ

गर्द-ए-ग़म सीं जो दिल हुआ मेला
अपने आँसू के आब सीं धोनाँ

शोख़ जादू-अदा ने मुझ पे 'सिराज'
गर्दिश-ए-चश्म सूँ किया टोनाँ