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हज़ार क़ैद-ए-ख़िज़ाँ से छुट कर बहार का आसरा करेंगे | शाही शायरी
hazar qaid-e-KHizan se chhuT kar bahaar ka aasra karenge

ग़ज़ल

हज़ार क़ैद-ए-ख़िज़ाँ से छुट कर बहार का आसरा करेंगे

शकील बदायुनी

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हज़ार क़ैद-ए-ख़िज़ाँ से छुट कर बहार का आसरा करेंगे
बहार भी हम-क़फ़स-ज़दों को न रास आई तो क्या करेंगे

अब और उस के सिवा न होगी क़फ़स में तस्कीन-ए-दिल की सूरत
चमन की जानिब नज़र उठा कर कभी कभी हंस लिया करेंगे

ये क्या ख़बर थी कि शाम-ए-फ़ुर्क़त मिरे लिए साज़गार होगी
वो माह-ओ-अंजुम की आड़ ले कर मिरे फ़साने सुना करेंगे

हमारे मशरब में थी न जाएज़ दर-ए-हरम की ये जुब्बा-साई
ये फ़र्ज़-ए-ना-ख़ुशगवार लेकिन अब उन की ख़ातिर अदा करेंगे

निगाह की बंदिशें सलामत जुनूँ की पाबंदियाँ मुसल्लम
कहीं भरम खुल गया तो ऐ दिल मैं क्या करूँगा वो क्या करेंगे

ये देखना है कि बा'द तर्क-ए-तअल्लुक़ात ऐ 'शकील' कब तक
न कोई हम पर जफ़ा करेगा न हम किसी से वफ़ा करेंगे