EN اردو
हरीम-ए-नाज़ को हम ग़ैर की महफ़िल नहीं कहते | शाही शायरी
harim-e-naz ko hum ghair ki mahfil nahin kahte

ग़ज़ल

हरीम-ए-नाज़ को हम ग़ैर की महफ़िल नहीं कहते

वासिफ़ देहलवी

;

हरीम-ए-नाज़ को हम ग़ैर की महफ़िल नहीं कहते
रक़ीबों पर मगर वो कौन था माइल नहीं कहते

जो रंग-ए-इश्क़ से फ़ारिग़ हो उस को दिल नहीं कहते
जो मौजों से न टकराए उसे साहिल नहीं कहते

इशारा शम्अ' का समझा न परवाना तो क्या समझा
मनार-ए-राह को अहल-ए-नज़र मंज़िल नहीं कहते

ब-रंग-ए-रिश्ता-ए-तस्बीह दिल से राह है दिल को
भटक जाए जो इस जादे से उस को दिल नहीं कहते

ज़ुलेख़ा के वक़ार-ए-इश्क़ को सहरा से क्या निस्बत
जो ख़ुद खींच कर न आ जाए उसे मंज़िल नहीं कहते

मरीज़-ए-ग़म की ग़फ़लत भी कमाल-ए-होशियारी है
जो गुम हो जाए जल्वों में उसे ग़ाफ़िल नहीं कहते

भरम उस का ही ऐ मंसूर तू ने रख लिया होता
किसी का राज़ ऐ नादाँ सर-ए-महफ़िल नहीं कहते