हर शाम दिलाती है उसे याद हमारी
इतनी तो हवा करती है इमदाद हमारी
कुछ हैं भी अगर हम तो गिरफ़्तार हैं अपने
ज़ंजीर नज़र आती है आज़ाद हमारी
ये शहर नज़र आता है हम-ज़ाद हमारा
और गर्द नज़र आती है फ़रियाद हमारी
ये राह बता सकती है हम कौन हैं क्या हैं
ये धूल सुना सकती है रूदाद हमारी
हम गोशा-नशीनों से है मानूस कुछ ऐसी
जैसे कि ये तन्हाई हो औलाद हमारी
अच्छा है कि दीवार के साए से रहें दूर
पड़ जाए न दीवार पे उफ़्ताद हमारी
ग़ज़ल
हर शाम दिलाती है उसे याद हमारी
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर

