हम यहाँ रहते हैं अपनी ही निगहबानी में
जब से मुश्किल नज़र आने लगी आसानी में
मेरे हाथों में ये कश्कोल थमाया किस ने
कैसा सामान मिला बे-सर-ओ-सामानी में
हाए क्या लोग थे जो जोश-ओ-जुनूँ रखते थे
अब कोई लुत्फ़ नहीं चाक-गरेबानी में
कभी इस शहर में कुछ देर ठहर कर देखो
ज़िंदगानी को रवाँ मौत की ताबानी में
हम ने इक उम्र बसर की है यहाँ भी लेकिन
कुछ इज़ाफ़ा न हुआ दश्त की वीरानी में
अक्स मेरा मुझे लगता है जहाँ-ताब हुआ
सर-ए-कोहसार दिखाई जो दिया पानी में
मेरे अतराफ़ हैं कितने ही परिंदे ख़ामोश
है कोई कामिल-ए-फ़न कार-ए-सुलैमानी में
ग़ज़ल
हम यहाँ रहते हैं अपनी ही निगहबानी में
हमदम कशमीरी

