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हम उन की अंजुमन का समाँ बन के रह गए | शाही शायरी
hum unki anjuman ka saman ban ke rah gae

ग़ज़ल

हम उन की अंजुमन का समाँ बन के रह गए

शकील बदायुनी

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हम उन की अंजुमन का समाँ बन के रह गए
सर-ता-क़दम निगाह ओ ज़बाँ बन के रह गए

पलटे मुक़द्दरात कुछ इस तौर से कि हम
तस्वीर-ए-इंक़िलाब-ए-जहाँ बन के रह गए

मज़लूम दिल की तल्ख़-नवाई तो देखना
नग़्मे जो लब तक आए फ़ुग़ाँ बन के रह गए

अब हम हैं और हक़ीक़त-ए-आलाम है 'शकील'
लम्हे ख़ुशी के ख़्वाब-ए-गिराँ बन के रह गए