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हैं सर-निगूँ जो ताना-ए-ख़ल्क़-ए-ख़ुदा से हम | शाही शायरी
hain sar-nigun jo tana-e-KHalq-e-KHuda se hum

ग़ज़ल

हैं सर-निगूँ जो ताना-ए-ख़ल्क़-ए-ख़ुदा से हम

रशीद रामपुरी

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हैं सर-निगूँ जो ताना-ए-ख़ल्क़-ए-ख़ुदा से हम
क्या हो गए किसी की मोहब्बत में क्या से हम

अब तक कभी के मिट गए होते जफ़ा से हम
ज़िंदा हैं ऐ 'रशीद' किसी की दुआ से हम

याद आ गए जब अपने गले में वो दस्त-ए-नाज़
रोए लिपट लिपट के तिरे नक़्श-ए-पा से हम

बीमार-ए-दर्द-ए-हिज्र की पुर्सिश से फ़ाएदा
अच्छे हैं या बुरे हैं तुम्हारी बला से हम

पैदा हुए हैं फिर से ये समझेंगे ऐ 'रशीद'
जीते बचे जो चारागरों की दवा से हम