गर दिल से भुलाई मिरी चाहत नहीं जाती
क्यूँ फिर तिरी इंकार की आदत नहीं जाती
फिर ओढ़ ली है हम ने तिरे नाम की चादर
फिर दिल से, वही घर की ज़रूरत नहीं जाती
क्यूँ रात के पर्दे में छुपा दिन नहीं आता?
क्यूँ आँख से लिपटी ये मसाफ़त नहीं जाती
क्यूँ वक़्त रुका है मिरी आँखों में अभी तक?
क्यूँ लम्स की तेरे वो तमाज़त नहीं जाती
क्यूँ वस्ल की बारिश नहीं होती मिरे आँगन?
क्यूँ हिज्र की 'नाहीद' ये हिद्दत नहीं जाती
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ग़ज़ल
गर दिल से भुलाई मिरी चाहत नहीं जाती
नाहीद विर्क