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दोनों जहाँ दे के वो समझे ये ख़ुश रहा | शाही शायरी
donon jahan de ke wo samjhe ye KHush raha

ग़ज़ल

दोनों जहाँ दे के वो समझे ये ख़ुश रहा

मिर्ज़ा ग़ालिब

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दोनों जहान दे के वो समझे ये ख़ुश रहा
याँ आ पड़ी ये शर्म कि तकरार क्या करें

थक थक के हर मक़ाम पे दो चार रह गए
तेरा पता न पाएँ तो नाचार क्या करें

क्या शम्अ के नहीं हैं हवा-ख़्वाह बज़्म में
हो ग़म ही जाँ-गुदाज़ तो ग़म-ख़्वार क्या करें