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छानता है ख़ाक क्या तू घर बनाने के लिए | शाही शायरी
chhanta hai KHak kya tu ghar banane ke liye

ग़ज़ल

छानता है ख़ाक क्या तू घर बनाने के लिए

ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर लखनवी

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छानता है ख़ाक क्या तू घर बनाने के लिए
फ़िक्र रहने की न कर आया है जाने के लिए

और को क्या रंज दूँ राहत उठाने के लिए
एक तिनके को न छेड़ूँ आशियाने के लिए

बर्क़ थी बेताब मेरे आशियाने के लिए
अब्र से भी पेशतर आए जलाने के लिए

काम आई मुर्ग़-ए-गुलशन के मिरी काहीदगी
ले गया तिनका समझ कर आशियाने के लिए

इस चमन से गुल चले बुलबुल गरेबाँ फाड़ कर
है जुनूँ तिनके जो चुनने आशियाने के लिए

हम ने क्यूँ माँगी थी गुलशन में दुआ-ए-जोश-ए-गुल
अब जगह मिलती नहीं है आशियाने के लिए

फिर वही हम थे वही तुम थे मोहब्बत थी वही
सुल्ह कर लेते अगर आँखें लड़ाने के लिए

हूँ वो ग़म-दीदा हँसे कोई तो मैं रोने लगूँ
कुछ बहाना चाहिए आँसू बहाने के लिए

साया पड़ जाए अगर ज़ुल्फ़-ए-दराज़-ए-यार का
फिर कहूँ मैं भी तसलसुल है ज़माने के लिए

हूँ वो दीवाना कि बन कर हो वो मजनूँ की शबीह
मेरी मिट्टी लें अगर लैला बनाने के लिए

पहुँची है शाने तलक क्या यार की ज़ुल्फ़-ए-रसा
दर्द क्यूँ पैदा हुआ है मेरे शाने के लिए

जुमला-तन है चश्म-ए-नर्गिस यार तेरी दीद को
गुल हमा-तन-गोश हैं तेरे फ़साने के लिए

यूँ मिरी क़िस्मत में था पर्वाज़ करना या नसीब
नोचते हैं तिफ़्ल पर मेरे उड़ाने के लिए

कौन होगा तेरे तीरों का निशाना मेरे बा'द
ख़ाक ले जाना मिरी तूदा बनाने के लिए

बज़्म-ए-आलम में खड़ा हूँ पर चला जाता हूँ मैं
सीख ली है शम्अ' से रफ़्तार जाने के लिए

क्यूँ दिल-ए-बेताब को दिखलाया ख़ाल-ए-ज़ेर-ए-ज़ुल्फ़
दाम में मछली नहीं आने की दाने के लिए

हो अगर सर-गश्तगी में फ़िक्र-ए-तामीर-ए-मकाँ
ख़ाक उड़ा लाए बगूला घर बनाने के लिए

अब किसी गुल-रू के दिल में कीजिए घर ऐ 'वज़ीर'
क्या चमन में तिनके चुनिए आशियाने के लिए