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चले ले के सर पर गुनाहों की गठरी | शाही शायरी
chale le ke sar par gunahon ki gaThri

ग़ज़ल

चले ले के सर पर गुनाहों की गठरी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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चले ले के सर पर गुनाहों की गठरी
सफ़र में ये है रू-सियाहों की गठरी

पड़ी रोज़-ए-महशर वहीं बर्क़ आ कर
जहाँ थी तिरे दाद-ख़्वाहों की गठरी

मुसाफ़िर मैं उस दश्त का हूँ कि जिस में
लुटी कितने गुम-कर्दा-राहों की गठरी

जहाँ सूस ने बहर से सर निकाला
मैं समझा है कश्ती तबाहों की गठरी

कुलाह-ए-ज़री माह-ए-नौ ने उड़ा ली
खुली थी कहीं कज-कुलाहों की गठरी

हम उन सरक़ा वालों में ऐ 'मुसहफ़ी' हैं
चुराते हैं जो बादशाहों की गठरी