ऐसा भी कोई ग़म है जो तुम से नहीं पाया
ऐसा भी कोई दर्द है जो दिल में नहीं है
सबा अकबराबादी
अपने जलने में किसी को नहीं करते हैं शरीक
रात हो जाए तो हम शम्अ बुझा देते हैं
सबा अकबराबादी
अज़ल से आज तक सज्दे किए और ये नहीं सोचा
किसी का आस्ताँ क्यूँ है किसी का संग-ए-दर क्या है
सबा अकबराबादी
अज़ल से आज तक सज्दे किए और ये नहीं सोचा
किसी का आस्ताँ क्यूँ है किसी का संग-ए-दर क्या है
सबा अकबराबादी
बाल-ओ-पर की जुम्बिशों को काम में लाते रहो
ऐ क़फ़स वालो क़फ़स से छूटना मुश्किल सही
सबा अकबराबादी
भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
सबा अकबराबादी
भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
सबा अकबराबादी

