आज क़ातिल का गले पर मिरे ख़ंजर चमका
लिल्लाहिल-हम्द कि मेरा भी मुक़द्दर चमका
रौनक़ टोंकवी
उड़ जाऊँगा बहार में मानिंद-ए-बू-ए-गुल
ज़ंजीर मेरे पा-ए-जुनूँ में हज़ार डाल
रौनक़ टोंकवी
उड़ जाऊँगा बहार में मानिंद-ए-बू-ए-गुल
ज़ंजीर मेरे पा-ए-जुनूँ में हज़ार डाल
रौनक़ टोंकवी
अब इस से क्या ग़रज़ ये हरम है कि दैर है
बैठे हैं हम तो साया-ए-दीवार देख कर
रविश सिद्दीक़ी
बुतान-ए-शहर को ये ए'तिराफ़ हो कि न हो
ज़बान-ए-इश्क़ की सब गुफ़्तुगू समझते हैं
रविश सिद्दीक़ी
बुतान-ए-शहर को ये ए'तिराफ़ हो कि न हो
ज़बान-ए-इश्क़ की सब गुफ़्तुगू समझते हैं
रविश सिद्दीक़ी
दर्द आलूदा-ए-दरमाँ था 'रविश'
दर्द को दर्द बनाया हम ने
रविश सिद्दीक़ी

