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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

मैं कैसे तय करूँ बे-सम्त रास्तों का सफ़र
कहाँ है शहर-ए-तमन्ना कोई पता तो दे

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर




न आए मेरे होंटों तक जो पैमाना नहीं आता
मिरी ख़ुद्दारियों को हाथ फैलाना नहीं आता

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर




नामूस-ए-ज़िंदगी ग़म-ए-इंसाँ में ढाल कर
सूती है रात जाम से सूरज निकाल कर

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर




नामूस-ए-ज़िंदगी ग़म-ए-इंसाँ में ढाल कर
सूती है रात जाम से सूरज निकाल कर

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर




नवाज़ा है मुझे पत्थर से जिस ने
उसे मैं फूल दे कर देखता हूँ

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर




रह-ए-क़रार अजब राह-ए-बे-क़रारी है
रुके हुए हैं मुसाफ़िर सफ़र भी जारी है

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर




रह-ए-क़रार अजब राह-ए-बे-क़रारी है
रुके हुए हैं मुसाफ़िर सफ़र भी जारी है

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर