मैं था किसी की याद थी जाम-ए-शराब था
ये वो नशिस्त थी जो सहर तक जमी रही
राजेन्द्र नाथ रहबर
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मैं था किसी की याद थी जाम-ए-शराब था
ये वो नशिस्त थी जो सहर तक जमी रही
राजेन्द्र नाथ रहबर
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आदमी ही के बनाए हुए ज़िंदाँ हैं ये सब
कोई पैदा नहीं होता किसी ज़ंजीर के साथ
राजेश रेड्डी
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अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास
लेने लगे हैं काम यक़ीं का गुमाँ से हम
राजेश रेड्डी
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अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास
लेने लगे हैं काम यक़ीं का गुमाँ से हम
राजेश रेड्डी
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बड़ी तस्वीर लटका दी है अपनी
जहाँ छोटा सा आईना था पहले
राजेश रेड्डी
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बहाना कोई तो ऐ ज़िंदगी दे
कि जीने के लिए मजबूर हो जाऊँ
राजेश रेड्डी
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