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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

क्या मिला जुज़ सुकूत-ए-बे-पायाँ
शोर सीने में कारवाँ भर था

नज़ीर आज़ाद




तिरा ख़याल मिरे दिल में कैसे घर करता
तिरा ख़याल मिरी वहशतों से आगे है

नज़ीर आज़ाद




तुझ में गर बारिश समुंदर के बराबर है तो क्या
मेरे अंदर भी है सहरा के बराबर तिश्नगी

नज़ीर आज़ाद




आ गया याद उन्हें अपने किसी ग़म का हिसाब
हँसने वालों ने मिरे अश्क जो गिन के देखे

नज़ीर बाक़री




आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आँसू मिरे दामन पे बिखर जाने दे

नज़ीर बाक़री




अपनी आँखों के समुंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे

नज़ीर बाक़री




इस लिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर
मेरी शह-रग पे मिरी माँ की दुआ रक्खी थी

नज़ीर बाक़री