यार के आगे पढ़ा ये रेख़्ता जा कर 'नज़ीर'
सुन के बोला वाह-वाह अच्छा कहा अच्छा कहा
नज़ीर अकबराबादी
ये जवाहिर-ख़ाना-ए-दुनिया जो है बा-आब-ओ-ताब
अहल-ए-सूरत का है दरिया अहल-ए-मा'नी का सराब
नज़ीर अकबराबादी
यूँ तो हम कुछ न थे पर मिस्ल-ए-अनार-ओ-महताब
जब हमें आग लगाई तो तमाशा निकला
नज़ीर अकबराबादी
यूँ तो हम थे यूँही कुछ मिस्ल-ए-अनार-ओ-महताब
जब हमें आग दिखाए तो तमाशा निकला
नज़ीर अकबराबादी
ज़माने के हाथों से चारा नहीं है
ज़माना हमारा तुम्हारा नहीं है
नज़ीर अकबराबादी
आँख भर इश्क़ और बदन भर चाह
शुक्र लब भर गिला ज़बाँ भर था
नज़ीर आज़ाद
आबाद है इस दिल का जहाँ जिस के क़दम से
वो मुझ को पुकारे है किसी और जहाँ से
नज़ीर आज़ाद

