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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

उठे उठ कर चले चल कर थमे थम कर कहा होगा
मैं क्यूँ जाऊँ बहुत हैं उन की हालत देखने वाले

मुज़्तर ख़ैराबादी




उठते जोबन पे खिल पड़े गेसू
आ के जोगी बसे पहाड़ों में

मुज़्तर ख़ैराबादी




वहाँ जा कर किए हैं मैं ने सज्दे अपनी हस्ती को
जहाँ बंदा पहुँच कर ख़ुद ख़ुदा मालूम होता है

मुज़्तर ख़ैराबादी




वक़्त आराम का नहीं मिलता
काम भी काम का नहीं मिलता

मुज़्तर ख़ैराबादी




वक़्त दो मुझ पर कठिन गुज़रे हैं सारी उम्र में
इक तिरे आने से पहले इक तिरे जाने के बाद

मुज़्तर ख़ैराबादी




वक़्त-ए-आख़िर क़ज़ा से बिगड़ेगी
आप उस वक़्त में करम न करें

मुज़्तर ख़ैराबादी




वो गले से लिपट के सोते हैं
आज-कल गर्मियाँ हैं जाड़ों में

मुज़्तर ख़ैराबादी