नहीं मंज़ूर जब मिलना तो वा'दे की ज़रूरत क्या
ये तुम को झूटी-मूटी आदत-ए-इक़रार कैसी है
मुज़्तर ख़ैराबादी
नमक-पाश ज़ख़्म-ए-जिगर अब तो आ जा
मिरा दिल बहुत बे-मज़ा हो रहा है
मुज़्तर ख़ैराबादी
नज़र के सामने का'बा भी है कलीसा भी
यही तो वक़्त है तक़दीर आज़माने का
मुज़्तर ख़ैराबादी
निछावर बुत-कदे पर दिल करूँ का'बा तो कोसों है
कहाँ ले जाऊँ इतनी दूर क़ुर्बानी मोहब्बत की
मुज़्तर ख़ैराबादी
निगाह-ए-यार मिल जाती तो हम शागिर्द हो जाते
ज़रा ये सीख लेते दिल के ले लेने का ढब क्या है
मुज़्तर ख़ैराबादी
निगाहों में फिरती है आठों-पहर
क़यामत भी ज़ालिम का क़द हो गई
मुज़्तर ख़ैराबादी
पड़ गए ज़ुल्फ़ों के फंदे और भी
अब तो ये उलझन है चंदे और भी
मुज़्तर ख़ैराबादी

