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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

जब उन की पत्तियाँ बिखरीं तो समझे मस्लहत उस की
ये गुल पहले समझते थे हवा बे-कार चलती है

मुज़्तर ख़ैराबादी




जगाने चुटकियाँ लेने सताने कौन आता है
ये छुप कर ख़्वाब में अल्लाह जाने कौन आता है

मुज़्तर ख़ैराबादी




जलेगा दिल तुम्हें बज़्म-ए-अदू में देख कर मेरा
धुआँ बन बन के अरमाँ महफ़िल-ए-दुश्मन से निकलेंगे

मुज़्तर ख़ैराबादी




जलवा-ए-रुख़सार-ए-साक़ी साग़र-ओ-मीना में है
चाँद ऊपर है मगर डूबा हुआ दरिया में है

मुज़्तर ख़ैराबादी




जनाब-ए-ख़िज़्र राह-ए-इश्क़ में लड़ने से क्या हासिल
मैं अपना रास्ता ले लूँ तुम अपना रास्ता ले लो

मुज़्तर ख़ैराबादी




जितने बुत हैं मैं सब पे मरता हूँ
मेरा ईमान एक हो तो कहूँ

मुज़्तर ख़ैराबादी




जिए जाते हैं पस्ती में तिरे सारे जहाँ वाले
कभी नीचे भी नज़रें डाल ऊँचे आसमाँ वाले

मुज़्तर ख़ैराबादी