पड़ गई जान जो उस तिफ़्ल ने पत्थर मारे
आज जुगनू की तरह हर शरर-ए-संग उड़ा
मुनीर शिकोहाबादी
पाया तबीब ने जो तिरी ज़ुल्फ़ का मरीज़
शामिल दवा में मुश्क-ए-शब-ए-तार कर दिया
मुनीर शिकोहाबादी
पहुँचा है उस के पास ये आईना टूट के
किस से मिला है शीशा-ए-दिल हम से फूट के
मुनीर शिकोहाबादी
रिंदों को पाबंदी-ए-दुनिया कहाँ
कश्ती-ए-मय को नहीं लंगर की चाह
मुनीर शिकोहाबादी
रोज़ दिल-हा-ए-मै-कशाँ टूटे
ऐ ख़ुदा जाम-ए-आसमाँ टूटे
मुनीर शिकोहाबादी
सब ने लूटे उन के जल्वे के मज़े
शर्बत-ए-दीदार जूठा हो गया
मुनीर शिकोहाबादी
सब्र कब तक राह पैदा हो कि ऐ दिल जान जाए
एक टक्कर मार कर सर फोड़ या दीवार तोड़
मुनीर शिकोहाबादी

