हम ज़ब्त की तारीख़ के हैं बाब 'रशीदी'
हम ज़ब्त की तारीख़ में पिन्हाँ नहीं होते
मुईद रशीदी
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इसी जवाब के रस्ते सवाल आते हैं
इसी सवाल में सारा जवाब ठहरा है
मुईद रशीदी
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ख़्वाब में तोड़ता रहता हूँ अना की ज़ंजीर
आँख खुलती है तो दीवार निकल आती है
मुईद रशीदी
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कोई आता है या नहीं आता
आज ख़ुद को पुकार कर देखें
मुईद रशीदी
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सुलगती धूप में जल कर फ़क़ीर-ए-शब तिरी ख़ाक
क्यूँ ख़ान-क़ाह-ए-शब-ए-बे-कराँ मैं बैठ गई
मुईद रशीदी
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तू मुझे ज़हर पिलाती है ये तेरा शेवा
ऐ मिरी रात तुझे ख़ून पिलाया मैं ने
मुईद रशीदी
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उस बार उजालों ने मुझे घेर लिया था
इस बार मिरी रात मिरे साथ चली है
मुईद रशीदी
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