यूँ तो अश्कों से भी होता है अलम का इज़हार
हाए वो ग़म जो तबस्सुम से अयाँ होता है
मक़बूल नक़्श
ज़िंदगी ख़्वाब देखती है मगर
ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं
मक़बूल नक़्श
जीना मुश्किल तो बहुत है तिरी इस दुनिया में
लेकिन इस ख़्वाब को मरना भी नहीं चाहिए है
मक़सूद वफ़ा
मुझ को तख़रीब भी नहीं आई
तोड़ता कुछ हूँ टूटता कुछ है
मक़सूद वफ़ा
आख़िर हुआ है हश्र बपा इंतिज़ार में
सुब्ह-ए-शब-ए-फ़िराक़ हुई मारवाड़ में
मर्दान अली खां राना
अबरू आँचल में दुपट्टे के छुपाना है बजा
तुर्क क्या म्यान में रखते नहीं तलवारों को
मर्दान अली खां राना
अश्क-ए-हसरत दीदा-ए-दिल से हैं जारी इन दिनों
कार-ए-तूफाँ कर रही है अश्क-बारी इन दिनों
मर्दान अली खां राना

