दिन भी डूबा कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं
जिस जगह बुझ गए आँखों के दिए रात हुई
मंज़र भोपाली
हमारे दिल पे जो ज़ख़्मों का बाब लिक्खा है
इसी में वक़्त का सारा हिसाब लिक्खा है
मंज़र भोपाली
इधर तो दर्द का प्याला छलकने वाला है
मगर वो कहते हैं ये दास्तान कुछ कम है
मंज़र भोपाली
इक मकाँ और बुलंदी पे बनाने न दिया
हम को पर्वाज़ का मौक़ा ही हवा ने न दिया
मंज़र भोपाली
इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए
कि हम भी 'मीर' का दीवान ले के आए हैं
मंज़र भोपाली
जो पारसा हो तो क्यूँ इम्तिहाँ से डरते हो
हम ए'तिबार का मीज़ान ले के आए हैं
मंज़र भोपाली
कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी
ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को
मंज़र भोपाली

