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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

दिन भी डूबा कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं
जिस जगह बुझ गए आँखों के दिए रात हुई

मंज़र भोपाली




हमारे दिल पे जो ज़ख़्मों का बाब लिक्खा है
इसी में वक़्त का सारा हिसाब लिक्खा है

मंज़र भोपाली




इधर तो दर्द का प्याला छलकने वाला है
मगर वो कहते हैं ये दास्तान कुछ कम है

मंज़र भोपाली




इक मकाँ और बुलंदी पे बनाने न दिया
हम को पर्वाज़ का मौक़ा ही हवा ने न दिया

मंज़र भोपाली




इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए
कि हम भी 'मीर' का दीवान ले के आए हैं

मंज़र भोपाली




जो पारसा हो तो क्यूँ इम्तिहाँ से डरते हो
हम ए'तिबार का मीज़ान ले के आए हैं

मंज़र भोपाली




कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी
ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को

मंज़र भोपाली