तुम्हारे नाम से मंसूब हो जाते हैं दीवाने
ये अपने होश में होते तो पहचाने कहाँ जाते
मख़मूर देहलवी
गो उम्र भर न मिल सके आपस में एक बार
हम एक दूसरे से जुदा भी न हो सके
मख़मूर जालंधरी
मौजूदगी-ए-जन्नत-ओ-दोज़ख़ से है अयाँ
रहमत है एक बहर मगर बे-कराँ नहीं
मख़मूर जालंधरी
ये फ़ैज़-ए-इश्क़ था कि हुई हर ख़ता मुआफ़
वो ख़ुश न हो सके तो ख़फ़ा भी न हो सके
मख़मूर जालंधरी
अब आ गए हो तो ठहरो ख़राबा-ए-दिल में
ये वो जगह है जहाँ ज़िंदगी सँवरती है
मख़मूर सईदी
बस यूँही हम-सरी-ए-अहल-ए-जहाँ मुमकिन है
दम-ब-दम अपनी बुलंदी से उतरता जाऊँ
मख़मूर सईदी
बुझती आँखों में सुलगते हुए एहसास की लौ
एक शो'ला सा चमकता पस-ए-शबनम देखा
मख़मूर सईदी

