जाड़े की रुत है नई तन पर नीली शाल
तेरे साथ अच्छी लगी सर्दी अब के साल
जयंत परमार
टैग:
| 2 लाइन शायरी |
जुगनू था तारा था क्या था
दरवाज़े पर कौन खड़ा था
जयंत परमार
टैग:
| 2 लाइन शायरी |
लाख छुपाए न छुपे इन रातों का भेद
आँखों के आकाश में पढ़े थे चारों वेद
जयंत परमार
टैग:
| 2 लाइन शायरी |
लम्स की वो रौशनी भी बुझ गई
जिस्म के अंदर अंधेरा और है
जयंत परमार
टैग:
| 2 लाइन शायरी |
माँग भरूँ सिंदूर से सजूँ सोला-सिंगार
जब तक पहनूँगी नहीं उन बाहोँ का हार
जयंत परमार
टैग:
| 2 लाइन शायरी |
मैं हूँ और ये दूर तक धूप का रस्ता साथ
काँधे पर साया कोई रख देता है हाथ
जयंत परमार
टैग:
| 2 लाइन शायरी |
दफ़्तर की थकन ओढ़ के तुम जिस से मिले हो
उस शख़्स के ताज़ा लब-ओ-रुख़्सार तो देखो
जाज़िब क़ुरैशी
टैग:
| 2 लाइन शायरी |

