कसी हैं भब्तियाँ मस्जिद में रीश-ए-वाइज़ पर
कहीं न मेरी तबीअ'त ख़ुदा गवाह रुकी
हबीब मूसवी
ख़ुदा करे कहीं मय-ख़ाने की तरफ़ न मुड़े
वो मोहतसिब की सवारी फ़रेब-ए-राह रुकी
हबीब मूसवी
किसी सूरत से हुई कम न हमारी तशवीश
जब बढ़ी दिल से तो आफ़ाक़ में फैली तशवीश
हबीब मूसवी
क्या हुआ वीराँ किया गर मोहतसिब ने मय-कदा
जम्अ' फिर कल शाम तक हर एक शय हो जाएगी
हबीब मूसवी
लब-ए-जाँ-बख़्श तक जा कर रहे महरूम बोसा से
हम इस पानी के प्यासे थे जो तड़पाता है साहिल पर
हबीब मूसवी
लिख कर मुक़त्तआ'त में दीं उन को अर्ज़ियाँ
जो दाएरे थे कासा-ए-दस्त-ए-गदा हुए
हबीब मूसवी
मय-कदा है शैख़ साहब ये कोई मस्जिद नहीं
आप शायद आए हैं रिंदों के बहकाए हुए
हबीब मूसवी

