मंज़िलें सम्तें बदलती जा रही हैं रोज़ ओ शब
इस भरी दुनिया में है इंसान तन्हा राह-रौ
फ़ुज़ैल जाफ़री
मिज़ाज अलग सही हम दोनों क्यूँ अलग हों कि हैं
सराब ओ आब में पोशीदा क़ुर्बतें क्या क्या
फ़ुज़ैल जाफ़री
तअल्लुक़ात का तन्क़ीद से है याराना
किसी का ज़िक्र करे कौन एहतिसाब के साथ
फ़ुज़ैल जाफ़री
तिरे बदन में मेरे ख़्वाब मुस्कुराते हैं
दिखा कभी मेरे ख़्वाबों का आईना मुझ को
फ़ुज़ैल जाफ़री
ये सच है हम को भी खोने पड़े कुछ ख़्वाब कुछ रिश्ते
ख़ुशी इस की है लेकिन हल्क़ा-ए-शर से निकल आए
फ़ुज़ैल जाफ़री
ज़हर मीठा हो तो पीने में मज़ा आता है
बात सच कहिए मगर यूँ कि हक़ीक़त न लगे
फ़ुज़ैल जाफ़री
ज़िद में दुनिया की बहर-हाल मिला करते थे
वर्ना हम दोनों में ऐसी कोई उल्फ़त भी न थी
फ़ुज़ैल जाफ़री

