मेरी जबीन-ए-शौक़ ने सज्दे जहाँ किए
वो आस्ताँ बना जो कभी आस्ताँ न था
फ़िगार उन्नावी
परतव-ए-हुस्न से ज़र्रे भी बने आईने
कितने जल्वे किए अर्ज़ां तिरी रानाई ने
फ़िगार उन्नावी
फूलों को गुलिस्ताँ में कब रास बहार आई
काँटों को मिला जब से एजाज़-ए-मसीहाई
फ़िगार उन्नावी
क़दम अपने हरीम-ए-नाज़ में इस शौक़ से रखना
कि जो देखे मिरे दिल को तुम्हारा आस्ताँ समझे
फ़िगार उन्नावी
क़दम क़दम पे दोनों जुर्म-ए-इश्क़ में शरीक हैं
नज़र को बे-ख़ता कहूँ कि दिल को बे-ख़ता कहूँ
फ़िगार उन्नावी
साक़ी ने निगाहों से पिला दी है ग़ज़ब की
रिंदान-ए-अज़ल देखिए कब होश में आएँ
फ़िगार उन्नावी
सर-ए-महफ़िल हमारे दिल को लूटा चश्म-ए-साक़ी ने
उधर तक़दीर गर्दिश में इधर गर्दिश में जाम आया
फ़िगार उन्नावी

