सफीर-ए-इश्क़ हमें अब तो हम सफ़र कर लो
हमारे पास तो सामान भी ज़ियादा नहीं
विपुल कुमार
इतना हैरान न हो मेरी अना पर प्यारे
इश्क़ में भी कई ख़ुद्दार निकल आते हैं
विपुल कुमार
कुछ इस लिए भी तिरी आरज़ू नहीं है मुझे
मैं चाहता हूँ मिरा इश्क़ जावेदानी हो
विपुल कुमार
मैं तो शब-ए-फ़िराक़ था तुम एक उम्र थी
फिर भी ज़ियादा तुम से गुज़ारा गया मुझे
विपुल कुमार
मुझ से कब उस को मोहब्बत थी मगर मेरे बा'द
उस ने जिस शख़्स को चाहा वो मिरे जैसा था
विपुल कुमार
उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो
उस दर्द पे ला'नत की जो अशआ'र में आ जाए
विपुल कुमार
वो एक हाथ बढ़ाएगा तुझ को पा लेगा
सो देख सब्र का एलान भी ज़ियादा नहीं
विपुल कुमार
उसे तो दौलत-ए-दुनिया भी कम भी पाने को
मिरी तो ज़ात का मीज़ान भी ज़ियादा नहीं
विपुल कुमार
इस से पहले कि ये आज़ार गवारा कर लें
आ मिरी जान मोहब्बत से किनारा कर लें
विपुल कुमार

