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सिराज औरंगाबादी शायरी | शाही शायरी

सिराज औरंगाबादी शेर

101 शेर

मुस्तइद हूँ तिरे ज़ुल्फ़ों की सियाही ले कर
सफ़्हा-ए-नामा-ए-आमाल कूँ काला करने

सिराज औरंगाबादी




मुश्ताक़ हूँ तुझ लब की फ़साहत का व-लेकिन
'राँझा' के नसीबों में कहाँ 'हीर' की आवाज़

सिराज औरंगाबादी




मुझ रंग ज़र्द ऊपर ग़ुस्से सीं लाल मत हो
ऐ सब्ज़ शाल वाले ऊदे रुमाल वाले

सिराज औरंगाबादी




मुझ कूँ हर आन तिरे दर्द सीं बहबूदी है
इश्क़-बाज़ी में रुख़-ए-ज़र्द ज़र-ए-सूदी है

सिराज औरंगाबादी




मैं हूँ तो दिवाना प किसी ज़ुल्फ़ का नहीं हूँ
वल्लाह कि रखता नहीं यक तार किसी का

सिराज औरंगाबादी




मकतब-ए-इश्क़ का मोअल्लिम हूँ
क्यूँ न होए दर्स-ए-यार की तकरार

सिराज औरंगाबादी




मकतब में मिरे जुनूँ के मजनूँ
नादान है तिफ़्ल-ए-अबजदी है

सिराज औरंगाबादी




मैं कहा क्या अरक़ है तुझ रुख़ पर
मुस्कुरा कर कहा कि फ़ित्ना है

सिराज औरंगाबादी




मरहम तिरे विसाल का लाज़िम है ऐ सनम
दिल में लगी है हिज्र की बर्छी की हूल आज

सिराज औरंगाबादी