शायद लोग इसी रौनक़ को गर्मी-ए-महफ़िल कहते हैं
ख़ुद ही आग लगा देते हैं हम अपनी तन्हाई को
शहज़ाद अहमद
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शब ढल गई और शहर में सूरज निकल आया
मैं अपने चराग़ों को बुझाता नहीं फिर भी
शहज़ाद अहमद
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शब की तन्हाइयों में याद उस की
झिलमिलाता हुआ दिया जैसे
शहज़ाद अहमद
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