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इस्माइल मेरठी शायरी | शाही शायरी

इस्माइल मेरठी शेर

55 शेर

शैख़ और बरहमन में अगर लाग है तो हो
दोनों शिकार-ए-ग़म्ज़ा उसी दिल-रुबा के हैं

इस्माइल मेरठी




परवाने की तपिश ने ख़ुदा जाने कान में
क्या कह दिया कि शम्अ के सर से धुआँ उठा

इस्माइल मेरठी




नेमत-ए-ख़ुल्द थी बशर के लिए
ख़ाक चाटी नज़र गुज़र के लिए

इस्माइल मेरठी




मर चुके जीते-जी ख़ुशा क़िस्मत
इस से अच्छी तो ज़िंदगी ही नहीं

इस्माइल मेरठी




माना बुरी ख़बर है प तेरी ख़बर तो है
सब्र-ओ-क़रार नज़्र करूँ नामा-बर को मैं

इस्माइल मेरठी




क्या कोहकन की कोह-कनी क्या जुनून-ए-क़ैस
वादी-ए-इश्क़ में ये मक़ाम इब्तिदा के हैं

इस्माइल मेरठी




क्या हो गया इसे कि तुझे देखती नहीं
जी चाहता है आग लगा दूँ नज़र को मैं

इस्माइल मेरठी




क्या है वो जान-ए-मुजस्सम जिस के शौक़-ए-दीद में
जामा-ए-तन फेंक कर रूहें भी उर्यां हो गईं

इस्माइल मेरठी




क्या फ़िक्र-ए-आब-ओ-नान कि ग़म कह रहा है अब
मौजूद हूँ ज़ियाफ़त-ए-दिल और जिगर को मैं

इस्माइल मेरठी