मैं एक बाब था अफ़साना-ए-वफ़ा का मगर
तुम्हारी बज़्म से उट्ठा तो इक किताब बना
हसन नईम
मैं अपनी रूह में उस को बसा चुका इतना
अब उस का हुस्न भी पर्दा दिखाई देता है
हसन नईम
क्या फ़िराक़ ओ फ़ैज़ से लेना था मुझ को ऐ 'नईम'
मेरे आगे फ़िक्र-ओ-फ़न के कुछ नए आदाब थे
हसन नईम
कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे
हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे
हसन नईम
कोई मौसम हो यही सोच के जी लेते हैं
इक न इक रोज़ शजर ग़म का हरा तो होगा
हसन नईम
आ बसे कितने नए लोग मकान-ए-जाँ में
बाम-ओ-दर पर है मगर नाम उसी का लिक्खा
हसन नईम
ख़ल्वत-ए-उम्मीद में रौशन है अब तक वो चराग़
जिस से उठता है क़रीब-ए-शाम यादों का धुआँ
हसन नईम
ख़ैर से दिल को तिरी याद से कुछ काम तो है
वस्ल की शब न सही हिज्र का हंगाम तो है
हसन नईम
कम नहीं ऐ दिल-ए-बेताब मता-ए-उम्मीद
दस्त-ए-मय-ख़्वार में ख़ाली ही सही जाम तो है
हसन नईम

