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भारत भूषण पन्त शायरी | शाही शायरी

भारत भूषण पन्त शेर

37 शेर

मैं थोड़ी देर भी आँखों को अपनी बंद कर लूँ तो
अँधेरों में मुझे इक रौशनी महसूस होती है

भारत भूषण पन्त




तू हमेशा माँगता रहता है क्यूँ ग़म से नजात
ग़म नहीं होंगे तो क्या तेरी ख़ुशी बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त




सूरज से उस का नाम-ओ-नसब पूछता था मैं
उतरा नहीं है रात का नश्शा अभी तलक

भारत भूषण पन्त




शायद बता दिया था किसी ने मिरा पता
मीलों मिरी तलाश में रस्ता निकल गया

भारत भूषण पन्त




सबब ख़ामोशियों का मैं नहीं था
मिरे घर में सभी कम बोलते थे

भारत भूषण पन्त




मैं अपने लफ़्ज़ यूँ बातों में ज़ाए कर नहीं सकता
मुझे जो कुछ भी कहना है उसे शेरों में कहता हूँ

भारत भूषण पन्त




कितना आसान था बचपन में सुलाना हम को
नींद आ जाती थी परियों की कहानी सुन कर

भारत भूषण पन्त




मैं अब जो हर किसी से अजनबी सा पेश आता हूँ
मुझे अपने से ये वाबस्तगी मजबूर करती है

भारत भूषण पन्त




उम्मीदों से पर्दा रक्खा ख़ुशियों से महरूम रहीं
ख़्वाब मरा तो चालिस दिन तक सोग मनाया आँखों ने

भारत भूषण पन्त