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भारत भूषण पन्त शायरी | शाही शायरी

भारत भूषण पन्त शेर

37 शेर

तू हमेशा माँगता रहता है क्यूँ ग़म से नजात
ग़म नहीं होंगे तो क्या तेरी ख़ुशी बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त




ख़ामोशी में चाहे जितना बेगाना-पन हो
लेकिन इक आहट जानी-पहचानी होती है

भारत भूषण पन्त




उस को भी मेरी तरह अपनी वफ़ा पर था यक़ीं
वो भी शायद इसी धोके में मिला था मुझ को

भारत भूषण पन्त




उसे इक बुत के आगे सर झुकाते सब ने देखा है
वो काफ़िर ही सही पक्का मगर ईमान रखता है

भारत भूषण पन्त




वर्ना तो हम मंज़र और पस-मंज़र में उलझे रहते
हम ने भी सच मान लिया जो कुछ दिखलाया आँखों ने

भारत भूषण पन्त




याद भी आता नहीं कुछ भूलता भी कुछ नहीं
या बहुत मसरूफ़ हूँ मैं या बहुत फ़ुर्सत में हूँ

भारत भूषण पन्त




ये क्या कि रोज़ पहुँच जाता हूँ मैं घर अपने
अब अपनी जेब में अपना पता न रक्खा जाए

भारत भूषण पन्त




ये क्या कि रोज़ उभरते हो रोज़ डूबते हो
तुम एक बार में ग़र्क़ाब क्यूँ नहीं होते

भारत भूषण पन्त




ये सब तो दुनिया में होता रहता है
हम ख़ुद से बे-कार उलझने लगते हैं

भारत भूषण पन्त