पैसे की बौछार में लोग रहे हमदर्द
बीत गई बरसात जब मौसम हो गया सर्द
बेकल उत्साही
नश्तर चाहे फूल से बर्फ़ से माँगे ख़ून
धूप खिलाए चाँद को अंधे का क़ानून
बेकल उत्साही
न जाने कौन सा नश्शा है उन पे छाया हुआ
क़दम कहीं पे हैं पड़ते कहीं पे चलते हैं
बेकल उत्साही
लोग तो जा के समुंदर को जला आए हैं
मैं जिसे फूँक कर आया वो मिरा घर निकला
बेकल उत्साही
किवाड़ बंद करो तीरा-बख़्तो सो जाओ
गली में यूँ ही उजालों की आहटें होंगी
बेकल उत्साही
अमृत रस की बीन पर ज़हर के नग़्मे गाओ
मरहम से मुस्कान के ज़ख़्मों को उकसाओ
बेकल उत्साही
इश्क़-विश्क़ ये चाहत-वाहत मन का भुलावा फिर मन भी अपना क्या
यार ये कैसा रिश्ता जो अपनों को ग़ैर करे मौला ख़ैर करे
बेकल उत्साही
हवा-ए-इश्क़ ने भी गुल खिलाए हैं क्या क्या
जो मेरा हाल था वो तेरा हाल होने लगा
बेकल उत्साही
हर एक लहज़ा मिरी धड़कनों में चुभती थी
अजीब चीज़ मिरे दिल के आस-पास रही
बेकल उत्साही

