पुराने घर की शिकस्ता छतों से उकता कर
नए मकान का नक़्शा बनाता रहता हूँ
असअ'द बदायुनी
लेता नहीं किसी का पस-ए-मर्ग कोई नाम
दुनिया को देखना है तो दुनिया से जा के देख
असअ'द बदायुनी
मेरी रुस्वाई के अस्बाब हैं मेरे अंदर
आदमी हूँ सो बहुत ख़्वाब हैं मेरे अंदर
असअ'द बदायुनी
मिरे बदन पे ज़मानों की ज़ंग है लेकिन
मैं कैसे देखूँ शिकस्ता है आइना मेरा
असअ'द बदायुनी
मोहब्बतें भी उसी आदमी का हिस्सा थीं
मगर ये बात पुराने ज़माने वाली है
असअ'द बदायुनी
परिंद क्यूँ मिरी शाख़ों से ख़ौफ़ खाते हैं
कि इक दरख़्त हूँ और साया-दार मैं भी हूँ
असअ'द बदायुनी
परिंद पेड़ से परवाज़ करते जाते हैं
कि बस्तियों का मुक़द्दर बदलता जाता है
असअ'द बदायुनी
फूलों की ताज़गी ही नहीं देखने की चीज़
काँटों की सम्त भी तो निगाहें उठा के देख
असअ'द बदायुनी
वो सारी बातें मैं अहबाब ही से कहता हूँ
मुझे हरीफ़ को जो कुछ सुनाना होता है
असअ'द बदायुनी

