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आग़ा अकबराबादी शायरी | शाही शायरी

आग़ा अकबराबादी शेर

27 शेर

जी चाहता है उस बुत-ए-काफ़िर के इश्क़ में
तस्बीह तोड़ डालिए ज़ुन्नार देख कर

आग़ा अकबराबादी




बुत नज़र आएँगे माशूक़ों की कसरत होगी
आज बुत-ख़ाना में अल्लाह की क़ुदरत होगी

आग़ा अकबराबादी




हमें तो उन की मोहब्बत है कोई कुछ समझे
हमारे साथ मोहब्बत उन्हें नहीं तो नहीं

आग़ा अकबराबादी




हम न कहते थे कि सौदा ज़ुल्फ़ का अच्छा नहीं
देखिए तो अब सर-ए-बाज़ार रुस्वा कौन है

आग़ा अकबराबादी




हाथ दोनों मिरी गर्दन में हमाइल कीजे
और ग़ैरों को दिखा दीजे अँगूठा अपना

आग़ा अकबराबादी




दो-शाला शाल कश्मीरी अमीरों को मुबारक हो
गलीम-ए-कोहना में जाड़ा फ़क़ीरों का बसर होगा

आग़ा अकबराबादी




देखो तो एक जा पे ठहरती नहीं नज़र
लपका पड़ा है आँख को क्या देख-भाल का

आग़ा अकबराबादी




देखिए पार हो किस तरह से बेड़ा अपना
मुझ को तूफ़ाँ की ख़बर दीदा-ए-तर देते हैं

आग़ा अकबराबादी




दश्त-ए-वहशत-ख़ेज़ में उर्यां है 'आग़ा' आप ही
क़ासिद-ए-जानाँ को क्या देता जो ख़िलअत माँगता

आग़ा अकबराबादी