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रेग-ए-दीरोज़ | शाही शायरी
reg-e-diroz

नज़्म

रेग-ए-दीरोज़

नून मीम राशिद

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हम मोहब्बत के ख़राबों के मकीं
वक़्त के तूल-ए-अलमनाक के पर्वर्दा हैं

एक तारीक अज़ल नूर-ए-अबद से ख़ाली
हम जो सदियों से चले हैं तो समझते हैं कि साहिल पाया

अपनी तहज़ीब की पाकोबी का हासिल पाया
हम मोहब्बत के निहाँ-ख़ानों में बसने वाले

अपनी पामाली के अफ़्सानों पे हँसने वाले
हम समझते हैं निशान-ए-सर-ए-मंज़िल पाया

हम मोहब्बत के के ख़राबों के मकीं
कुंज-ए-माज़ी में हैं बाराँ-ज़दा ताइर की तरह आसूदा

और कभी फ़ितना-ए-नागाह से डर कर चौंकें
तो रहें सिद्द-ए-निगाह नींद के भारी पर्दे

हम मोहब्बत के ख़राबों के मकीं!
ऐसे तारीक ख़राबे कि जहाँ

दूर से तेज़ पलट जाएँ ज़िया के आहू
एक बस एक सदा गूँजती हो

शब-ए-आलाम की ''याहू! याहू''
हम मोहब्बत के ख़राबों के मकीं

रेग-ए-दीरोज़ में ख़्वाबों के शजर बोते रहे
साया नापैद था साए की तमन्ना के तले सोते रहे